दूसरे राज्यों से आए व्यक्तियों को क्वारेंटाइन सेंटर में रखा गया है। यहां रुकने वाले सभी मरीजों के सैंपल न लेकर विभाग ने रैंडम सैंपल लिए थे। जिसमें से प्रतिदिन 3-3 व्यक्तियों का स्वाब लेकर रायगढ़ मेडिकल कॉलेज भेजा जा रहा था। इन्हीं रैंडम सैंपल की जांच में दो लोगों में कोरोना होने की पुष्टि हुई है। जबकि अभी भी 100 से अधिक सैंपल की रिपोर्ट आना बाकी है।
लैलूंगा क्वारेंटाइन सेंटर से भेजे गए सैंपलों में कोविड-19 की पुष्टि होने के बाद संक्रमण को लेकर खतरा बढ़ गया है। संक्रमित मरीजों में कोरोना के लक्षण नहीं मिले हैं। इससे विभाग के लिए खतरा भांप पाना मुश्किल हो रहा है। जिनकी इम्युनिटी कम है, जो कैंसर पीड़ित जिनकी कीमोथेरेपी, किडनी के मरीज, शुगर, हाइपरटेंशन से पीड़ित हैं, डॉक्टर उनपर ज्यादा खतरा बता रहे हैं। ऐसे मरीजों में संक्रमण का पता दो से 14 दिन में चल पाता है। जिन प्रवासी मजदूरों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक है, उनमें संक्रमण के बाद भी लक्षण तुरंत नहीं दिखेंगे।
सैंपल की जांच में कितनी सावधानी जरूरी
- मेडिकल कॉलेज के माइक्रो बायोलॉजी विभाग के डाॅ. राकेश कुमार ने बताया कि कोरोना की जांच करते वक्त रिसर्च टीम के सदस्यों के भी कोरोना संक्रमित होने का खतरा रहता है
- क्वारेंटाइन सेंटर से भेजा गया सैंपल लैब के बाहर रखा जाता है। लैब में खिड़की के रास्ते भेजा जाता है।
- संक्रमण के खतरे के कारण सैंपल को बायो सेफ्टी कैबिनेट (अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता की मशीन) में 3 चरण में गुजारा जाता है।
- इस मशीन में हवा बाहर से अंदर की ओर आती है ताकि वायरस हवा से लैब के डॉक्टर को संक्रमित न कर दे।
- मशीन में जमा हवा को बाहर छोड़ने से पहले हेफा फिल्टर से गुजारा जाता है ताकि हवा के साथ वायरस बाहर ना आ सके।
- सैंपल से आरएनए को एक सूक्ष्म छेद के जरिए प्रमुख लैब की आरटीपीसीआर मशीन में डाला जाता है।
- जांच पूरी होने में तीन घंटे तक का समय लगता है।
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