(चंद्रकुमार दुबे)लाॅकडाउन के चलते शहर में घूम रहे भूखे बेजुबान जानवरों को खाना खिलाने का बीड़ा यहां के वेटनरी डाॅक्टरों की टीम ने अपने खर्चे पर उठाया है। इनकी 20 लोगों की टीम है। ये रोज शाम को बस्ती से दूर जाते हैं और दूध, पका चावल व घास खिलाते हैं। पिछले 15 दिनों में इन्होंने 6000 से अधिक भूखे मवेशी, कुत्तों व सुअरों को खाना खिला चुके हैं। बेजुबान अब इन्हें पहचानने लगे हैं। जैसे ही इनकी गाड़ी पहुंचती है दौड़कर पहुंच जाते हैं। लाॅक डाउन के चलते खाने-पीने की समस्या सिर्फ इंसानों के सामने ही नहीं शहर में लोगों के भरोसे जीने वाले जानवरों के सामने भी उठ खड़ी हुई है।
वेटनरी टीम के डाॅ. आरएन त्रिपाठी के अनुसार इंसान तो अपनी समस्या को लेकर हल्ला मचाता है पर बेजुबान कुछ बोल नहीं पाते पर उनकी सूनी आंखों सबकुछ कह देते हैं और उनकी टीम इन्हें बेहतर तरीके से समझती है। पशु चिकित्सा विभाग के संयुक्त संचालक डाॅ. आरके साेनवाने के नेतृत्व में डॉ. आरएन त्रिपाठी पशु चिकित्सक सहायक शल्य, डाॅ. राज जायसवाल सहित स्टाॅफ के चंद्रकुमार जायसवाल, जयंत श्रीवास्तव, पराग चंद्रा, मुकेश तिवारी, केएन गजभिए, महेंद्र कुमार शुक्ला सहित करीब 20 लोगों की टीम है।
इसमें हर दिन कोई न कोई शहरी भी शामिल हो जाता है। कुम्हारपारा स्थित स्कूल में मवेशियों के लिए पहले खाना बनता है। यह काम भी खुद टीम के सदस्य करते हैं। स्कूल के करीब रहने वाले वेटनरी बाबू तनमय ओत्तलवार, राजेद्र लांजेवार व जयंत श्रीवास्तव इसमें सहयोग करते हैं। राशन व दूध की व्यवस्था टीम के सदस्य खुद ही करते हैं। स्टाॅफ के लोग हर दिन कोई 50 तो कोई 20 या फिर 10-15 किलो चावल लाकर दे देता है। दूध व चारे के लिए के लिए भी पैसे देते हैं। खाना, दूध व चारा को गाड़ी में भरकर ले जाते हैं। इसमें एक ड्रम पानी भी रखते हैं। वेटनरी डाॅक्टरों के अनुसार जानवर भूखे रहते हैं। चिंगराजपारा चाैक पर हर रोज 40-45 कुत्ते मिलते हैं। गाड़ी को देखते ही भागकर उनके करीब आ जाते हैं। सभी को पत्तल के बने दोनों से चावल व दूध दिया जाता है।
खाना के साथ साथ इलाज भी करते हैं
वेटनरी की टीम ने महामारी के दौरान अनाथ गाय, कुत्तों का इलाज भी किया। एक कुतिया की उन्होंने बड़ी स्तन ग्रंथि को निकाला, जो सीरियस थी। एक की लार ग्रंथि से ट्यूमर को भी हटाया। सीमित संसाधन के भीतर व कोरोना वायरस के संक्रमण को देखते हुए सभी सावधानियां बरतीं।
6000 जानवराें को खिला चुके हैं
डॉ. त्रिपाठी के अनुसार सब कुछ स्वप्रेरणा से चल रहा है। अभी तक 6000 से अधिक गाय, बैल, कुत्ता, सुअर को खाना खिला चुके हैं। पहले एक दो दिन साेयाबीन की बड़ी बनाकर ले गए पर मूक जानवर सूंघकर चले गए। इस बीच एक सज्जन को चावल, दूध खिलाते देखा तो उनकी टीम ने भी वही बनाना शुरू किया। उन्होंने बताया कि यह बहुत पुण्य का काम है। बेजुबान जानवरों को खाना देने से काफी तसल्ली मिलती है। जब तक लाॅक डाउन है यह काम वे करते रहेंगे। अभी तक प्रशासन से किसी तरह का सहयोग नहीं लिया है।
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