कहा जाता है कि व्यक्ति की अगर कोई सबसे अच्छी मित्र हैं तो वे किताबें हैं, लेकिन इस आधुनिक दौर में पुस्तकों की जगह पीडीएफ फाइलों ने ले ली हैं, जिसे कोई भी कहीं भी एक्सेस कर अपने स्मार्टफोन, लैपटॉप और टैबलेट पर पढ़ सकता है। वहीं धीरे-धीरे अब लोगों का पुस्तक खरीदकर पढ़ने का शौक कम होता चला जा रहा है। एक समय था, जब लोग दुकान से पुस्तक खरीदकर इन्हें पढ़ते थे। यही नहीं, इसके कलेक्शन भी अपने घरों में बनाई जाने वाली छोटी-छोटी लाइब्रेरी में रखते थे, लेकिन अब लाइब्रेरी खत्म होती चली जा रही है, क्योंकि अब किताबों के कलेक्शन लोगों के पास पेन ड्राइव या कम्प्यूटर-स्मार्टफोन में बन रही है। लॉकडाउन के इस दौर में घर पर बैठे बच्चे कम्प्यूटर पर कॉमिक्स और दूसरी किताबें पढ़ने में समय बिता रहे हैं।
अब कॉमिक्स भी ऑनलाइन पढ़ने का क्रेज
कॉमिक्स का क्रेज जहां 90 के दशक में खासा देखने को मिलता था, लेकिन धीरे-धीरे बच्चे कॉमिक्स पढ़ने से अलग होते चले गए। इधर अब स्मार्टफोन या कम्प्यूटर का उपयोग करने वाले बच्चे सीधे इंटरनेट पर कॉमिक्स सर्च कर इसकी पीडीएफ फाइल डाउनलोड कर इसे पढ़ रहे हैं। भौतिक रूप से किताब पढ़ना और किताबों की सॉफ्टकॉपी से इसे पढ़ने में बहुत अंतर होता है। शहर के 45 साल के संतोष झा बताते हैं कि वे स्मार्टफोन से बच्चों को कम ही पढ़ने देते हैं और किताबों से पढ़ने ही प्रेरित करते हैं।
लाइब्रेरी में भी औसतन 15-20 लोग ही पहुंचते हैं
इन दिनों हालांकि जिला ग्रंथालय बंद है, लेकिन जब तक यह चालू रहा, तब तक औसतन दिन में 15 से 20 लोग ही पहुंच पाते हैं। इसके पीछे का कारण ये है कि इंटरनेट की दुनिया में उन्हें तमाम किताबें और जानकारियों मिल जाती हैं, ऐसे में किताबों को खरीदकर पढ़ने का शौक लोगों ने खत्म कर दिया है।
बच्चों में पढ़ने की प्रवृत्ति बढ़ाती थीं कॉमिक्स
पहले बच्चे नई कॉमिक्स की सीरिज का इंतजार करते हुए बुक स्टॉल के लगातार चक्कर लगाते थे। उस दौर में नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, परमाणु, तिरंगा, डोगा जैसे किरदार बच्चों को खूब भाते हैं, अब बच्चे इनके बारे में जानते ही नहीं।
सदस्यता शुल्क बढ़ा इसलिए लोग नहीं आ रहे
ग्रंथालय प्रभारी मोहम्मद हुसैन ने बताया 2014 से सदस्यता शुल्क में बढ़ोतरी कर इसे 1 हजार कर दिया गया। इससे पहले 35 से 40 रुपए सदस्यता शुल्क और प्रति किताब 5 रुपए ही देना होता था। फीस बढ़ने से लोग कटते भी चले गए।
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