तीन दिन के कर्फ्यू ने सब्जी उत्पादक किसानों को बेहद नुकसान पहुंचाया है। जिले की वर्तमान सबसे बड़ी थोक सब्जी मंडी बैकुंठधाम और दुर्ग बंद होने की वजह से सब्जी ही नहीं आई।किसानों की 2490 टन सब्जी बेकार हो गई। इससे किसानों को करीब 27 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। लौकी, भिंडी, पत्ता गोभी, करेला जैसी सब्जियों लोगों के खरीदने के लायक नही बची। इसलिए इन सब्जियों को खाद बनाने के लिए फेंक दिए। मुफ्त तक किसानों ने सब्जी बांटी।
लॉक डाउन की वजह से सब्जी उत्पादक किसान सब्जियों को दीगर प्रदेशों की मंडियों में नही बेच पा रहे हैं और न ही वहां के कोचिए दुर्ग व भिलाई की मंडियों में सब्जी लेने आ पा रहे हैं। इसकी वजह से लोकल स्तर पर ही सब्जियों को बेची जा रही। 16 अप्रैल से 19 अप्रैल तक कर्फ्यू की वजह से दोनों प्रमुख मंडियों मे सब्जी नहीं आ सकी। लौकी, भिंडी,टमाटर, करेला, मिर्च, गलका, पत्ता गोभी, बरबटी, गोभी जैसी रोजाना निकलने वाली सब्जियां उपयोग करने के लायक नहीं रही।
फैक्ट फाइल-
- जिले में 9140 हेक्टेयर में लिया गया है टमाटर का उत्पादन
- जिले में 29471 हेक्टेयर में उगाई गई है साग-सब्जी
- 1610 हेक्टेयर में अन्य सब्जी का उत्पादन
- इस तरह हुआ है किसानों को नुकसान
केस-1: पथरिया के किसान गणेश पटेल बताते हैं कि 16 टन लौकी मंडी में बिकने के लिए जाती है। मंडी नहीं खुली इसलिए लौकी सख्त हो गई। उसे घुरवा में फेंका। किसान विपुल ने भी समस्या बताई।
केस-2: ननकट्ठी के किसान लीमन साहू ने 70 एकड़ की बाड़ी में सब्जी उत्पादन करने हैं। चार एकड़ की भिंडी तीन दिन में टूटी नहीं और खराब हो गई। इसे मवेशियों को खिलाने गांव के लोगों में बांटा।
केस-3: मेडेसरा के किसान संदीप सोलंकी ने 4 एकड़ मे करेला और 5 एकड़ में टमाटर की फसल ली है। करेला पक गए और टमाटर भी बेकार हो गए हैं। नई गोभी की सब्जी भी नहीं टूटने से खराब हुए।
65% सब्जी दुर्ग से जाती है दीगर राज्यों में
दुर्ग जिले में सब्जी का उत्पादन 1 लाख 6 हजार 747 एकड़ में हो रहा है। सबसे ज्यादा साग सब्जी 73 हजार 677 एकड़ क्षेत्रफल में ली गई है। टमाटर 22 हजार 850 एकड़ में ली गई है। साग सब्जी 73 हजार 677 एकड़ क्षेत्रफल में ली गई है। दुर्ग से कुल उत्पादन का 65% दूसरे राज्यों में भेजी जाती है।
किसानों की लागत तक नहीं निकल रही
लोकल मंडियों में पूरी सब्जियों की खपत किसानों को करना पड़ रहा है। दीगर राज्यों के हिसाब से उत्पादन लिया लेकिन स्थानीय मंडियों में बेचने की वजह से थोक में दाम बेहद कम हो गए है। किसान बताते हैं कि एक किलो कुंदरू की तुड़ाई में तीन रुपये खर्च आते हैं। लागत भी नहीं निकल पा रही है।
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