दुनिया के वे राष्ट्र जो स्वास्थ्य सेवाओं के पैमाने पर अग्रणी, आर्थिक रूप से अतिसंपन्न और वैज्ञानिक विकास के अगुआ माने जाते थे, कोरोना के सामने पस्त हो गए। ऐसे में भारत में यह संकट कैसा हो सकता है या उसकी विकरालता कितनी भयावह हो सकती है, यह कहना मुश्किल है। मानव विकास सूचकांक पर आज भी 129वें स्थान पर ठहरे देश के 139 करोड़ लोगों के भाग्य को मात्र इस विश्वास पर कि सरकार कुछ करेगी, नहीं छोड़ा जा सकता। सरकार के प्रयास चल रहे हैं, लेकिन हमारा अशिक्षित, गरीब और अतार्किक समाज का एक हिस्सा जरूरी सावधानियों का अनुपालन करने की जगह उसे नकराने में लगा है। जनता कर्फ्यू के दिन घंटा-घड़ियाल बजाने को भी इतने अतार्किक तरीके में लिया कि झुंड के झुंड बूढ़े-बच्चे-युवा सड़कों और पार्कों में आ गए। यानी कोरोना के खिलाफ संघर्ष में एक और शिकस्त। यह सब तथाकथित पढ़े-लिखे और संपन्न वर्ग के लोग थे, लेकिन शायद उनमें वैज्ञानिक सोच का अभाव था। उत्तर प्रदेश के एक जिले के डीएम और एसपी पचासों लोगों के हुजूम में सड़क पर घंटा बजाते हुए दिखे। यह भक्ति भाव प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को खुश करने का था न कि कोरोना से जीतने का। ऐसे में मुंबई, सूरत और दिल्ली से रोजी-रोटी छोड़कर अपने गांव के लिए करोड़ों की संख्या में पलायन कर रहे अशिक्षित गरीब मजदूरों को कौन समझाएगा कि इससे वे इस रोग को उस निम्न स्तर तक फैला देंगे जो सरकार के नियंत्रण के बाहर चला जाएगा। दुनिया में अपनी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए ख्यात अमेरिका, ब्रिटेन, इटली और स्पेन भी आज इस संकट से जूझने में अपने को कमतर पा रहे हैं। अमेरिका में अगर आज 40 फीसदी अस्पताल केवल कोरोना के मरीजों के इलाज के लिए चिह्नित कर दिए जाएं तो भी इस बीमारी के मरीजों के लिए बेड कम पड़ जाएंगे। भारत में न तो उतने डॉक्टर हैं न नर्सें और न ही अस्पताल या बेड। ऊपर से हमारी आबादी अमेरिका से चार गुना ज्यादा है और क्षेत्रफल लगभग एक तिहाई। लिहाजा सिर्फ एक ही उपाय है, समाज का अग्रणी तबका निकले और सभी को समझाए कि यह गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है, जिसे सरकार पर छोड़कर चुनाव के दौरान खाली उसकी आलोचना की जाए। कोरोना से जंग तभी सफल होगी, जब एक-एक व्यक्ति सही सोच के साथ सरकार के आदेश माने और वैज्ञानिक सोच से चले।
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