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वैद्य रगड़जी और चिपका वायरस


उनका शोध बोध इतना प्रबल है कि वायरस चाहे एचआईवी ही क्यों न हो, बचने के लिए पहली सलाह यही है कि हाथ न मिलाना वरना हाथों-हाथ वायरस उधर से इधर चल पड़ेगा और आप संक्रमित हो मदद को टापते रह जाएंगे। उनका बस चले तो चार नग लौंग और पांच पत्ती तुलसी के दम पर एचआईवी के गढ़ में कूद जाएं। टांट में एक गांठ हल्दी और दांत में एक नग मुलेठी दाब हैपेटाइटिस को नाथ दें। जैतून से ज़ीका को पछाड़ दें और सेंधे नमक के बूते निपाह को निपटा दें। कई दफा तो वायरस का नाम सुनकर ही वह उत्साह से ऐसे भर गए कि स्टॉर्म वर्म, ट्रोजन हॉर्स जैसे कम्प्यूटर के वायरस को भी पेट के चिनूनों और घोड़ों से फैलने वाले वायरस मानकर उपचार के लिए गौमूत्र और धतूरे का काढ़ा पेल बैठे। उन्हें टोका गया कि रगड़ जी, इस दफा कुछ ऊंची ही बात रगड़ गई, वह पीछे न हटे। बोले, “वायरस तो वायरस होता है। चाहे आदमी को लगे या कम्प्यूटर को। लिहाज़ा और कुछ नहीं तो कम्प्यूटर के आसपास नीम का धुआं अवश्य करना चाहिए।’

इस बार दुनिया भर में फैले कोरोना वायरस से निबटने के लिए उन्होंने पुराने सारे वायरसों के उपचार निचोड़ निचोड़कर उनकी अपनी भाषा में एकदम ओरिजिनल नुस्ख़ा तैयार किया है जो व्हाट्सएप वीरों की वरेण्य विद्वत्ता से वायरल हो चुका है। वायरल हुए इस विचित्रोपचार पर मैं सिर पीटने के लिए विवश हूं। यों मैंने शुरू में ही कहा था कि आप वैद्य रगड़जी को न जानते हों तो जान लें। कौन जाने, कल को उन्हें स्वास्थ्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार मिल जाए। कमज़कम अपनी वायरल होती विलक्षण वायरोलॉजी पर उन्हें इस बात का पूरा भरोसा है, इसलिए फ़िलहाल गूगल को रगड़कर वह नोबेल फाउंडेशन को ही खोज रहे हैं। यह और बात है कि ख़ुद मैं और उनसे संक्रमित कई लोग उन्हें चिपका वायरस मानकर उनसे मुक्ति का उपाय खोज रहे हैं

ज़ीका, निपाह, इबोला, एच -1, एन -1 जैसा कैसा भी ख़तरनाक वायरस क्यों न हो, ऐसा कोई वायरस न होगा जिसे उन्होंने तबीयत से कीपैड पर रगड़ा न हो और उस पर कहर बनकर न टूटे हों। व्हाट्सएप पर इन वायरसों पर कहर बरपाने के लिए उनके स्टॉक में कुछ सलाहें तो एकदम रेडीमेड हैं। मसलन दूर रहना, हाथ न मिलाना, गले न मिलना। ऐसी सलाहें वह बोल्ड अक्षरों में यूं देते हैं मानो डब्ल्यूएचओ कल ही हारफूल के साथ आला दर्ज़े का आला भी उनके गले में डालने दौड़ पड़ेगा।

उनका शोध बोध इतना प्रबल है कि वायरस चाहे एचआईवी ही क्यों न हो, बचने के लिए पहली सलाह यही है कि हाथ न मिलाना वरना हाथों-हाथ वायरस उधर से इधर चल पड़ेगा और आप संक्रमित हो मदद को टापते रह जाएंगे। उनका बस चले तो चार नग लौंग और पांच पत्ती तुलसी के दम पर एचआईवी के गढ़ में कूद जाएं। टांट में एक गांठ हल्दी और दांत में एक नग मुलेठी दाब हैपेटाइटिस को नाथ दें। जैतून से ज़ीका को पछाड़ दें और सेंधे नमक के बूते निपाह को निपटा दें। कई दफा तो वायरस का नाम सुनकर ही वह उत्साह से ऐसे भर गए कि स्टॉर्म वर्म, ट्रोजन हॉर्स जैसे कम्प्यूटर के वायरस को भी पेट के चिनूनों और घोड़ों से फैलने वाले वायरस मानकर उपचार के लिए गौमूत्र और धतूरे का काढ़ा पेल बैठे। उन्हें टोका गया कि रगड़ जी, इस दफा कुछ ऊंची ही बात रगड़ गई, वह पीछे न हटे। बोले, “वायरस तो वायरस होता है। चाहे आदमी को लगे या कम्प्यूटर को। लिहाज़ा और कुछ नहीं तो कम्प्यूटर के आसपास नीम का धुआं अवश्य करना चाहिए।’

अभी -अभी रगड़ जी ने एकदम नया व अद्भुत संदेसा मेरी वॉल पर चिपकाया है। इस दफा यह संदेसा कोरोना वायरस से बचाव को लेकर है। यदि आप रगड़ जी को नहीं जानते हों तो जान लें। उपचार के तरीकों की खोज में वह रात दिन मोबाइल को रगड़ते हैं। उनके गूगल निकेतन के आगे शांति निकेतन भी फेल है, ऐन वैसे ही जैसे व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के आगे ऑक्सफोर्ड। बग़ैर कोई डॉक्टरी या वैद्यई पढ़े वह सारी पैथियों को ठेंगे पर धरते हैं और चुटकियों में हर मर्ज़ का उपचार बताते हैं। हेपेटाइटिस से लेकर न्युमोनोअल्ट्रामाइक्रोस्कोपिक सिलकोवोस केनोकोनियोसिस तक का इलाज़ है उनके पास। वह गूगल पर बंगाली, अफगानी, अराकानी और यूनानी पद्धति के ‘इलाज़ बिल ग़िज़ा’ और ‘इलाज़ बिल दवा’ टाइप के तमाम नुस्ख़े चपेटते हैं। तब ‘अटन की टटन में और टटन की अटन में’ कूटकर अपना मौलिक नुस्ख़ा तैयार कर व्हाट्सएप पर चिपकाते हैं।

उनकी निगाह में दुनिया के हर मर्ज़ के लिए वायरस ही ज़िम्मेदार हैं। एक दफा ऑफ़िस में बाबुओं की लेटलतीफी को मैंने ‘एक्यूट डेफिशिएंसी ऑफ सिन्सियरटी सिंड्रोम’ बताया, उन्होंने चहककर इसके पीछे भी वायरस का हाथ होना बताया और उपचार के लिए प्याज के रस और कपूर की धूनी सुझा बैठे।

विश्व भर के वायरसों पर उनका विशेषाधिकार है। यूं मानिए, वायरसों को उनकी नहीं, उन्हें वायरसों की ज़्यादा प्रतीक्षा रहती है। यही कारण है कि वायरस का प्रकोप बुर्किनाफासो में हो या उलानबटोर में, वह उसे रगड़ने के इतने तरीके बटोर लाते हैं कि वायरस को भी भारत की ओर श्रीमुख करने से पहले दसियों बार सोचना पड़े।

ज़ीका, निपाह, इबोला, एच -1, एन -1 जैसा कैसा भी ख़तरनाक वायरस क्यों न हो, ऐसा कोई वायरस न होगा जिसे उन्होंने तबीयत से कीपैड पर रगड़ा न हो और उस पर कहर बनकर न टूटे हों। व्हाट्सएप पर इन वायरसों पर कहर बरपाने के लिए उनके स्टॉक में कुछ सलाहें तो एकदम रेडीमेड हैं। मसलन दूर रहना, हाथ न मिलाना, गले न मिलना। ऐसी सलाहें वह बोल्ड अक्षरों में यूं देते हैं मानो डब्ल्यूएचओ कल ही हारफूल के साथ आला दर्ज़े का आला भी उनके गले में डालने दौड़ पड़ेगा।

अभी -अभी रगड़ जी ने एकदम नया व अद्भुत संदेसा मेरी वॉल पर चिपकाया है। इस दफा यह संदेसा कोरोना वायरस से बचाव को लेकर है। यदि आप रगड़ जी को नहीं जानते हों तो जान लें। उपचार के तरीकों की खोज में वह रात दिन मोबाइल को रगड़ते हैं। उनके गूगल निकेतन के आगे शांति निकेतन भी फेल है, ऐन वैसे ही जैसे व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के आगे ऑक्सफोर्ड। बग़ैर कोई डॉक्टरी या वैद्यई पढ़े वह सारी पैथियों को ठेंगे पर धरते हैं और चुटकियों में हर मर्ज़ का उपचार बताते हैं। हेपेटाइटिस से लेकर न्युमोनोअल्ट्रामाइक्रोस्कोपिक सिलकोवोस केनोकोनियोसिस तक का इलाज़ है उनके पास। वह गूगल

व्यंग्य

मलय जैन

व्यंग्यकार



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