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ज़िंदगी इक सफ़र है सुहाना...


जी. पी. सिप्पी (जन्म- 1914, मृत्यु- 2007)

जी.पी. सिप्पी की ढेर सारी ख़ूबियों में से एक ख़ूबी नए टैलेंट को मौका देने की भी रही है। वह पहले बड़े फ़िल्मकार थे, जिन्होंने बड़े पर्दे के साथ ही साथ टीवी सीरियल्स की तरफ़ कदम बढ़ाए।

इस विवाद के चलते ही जी.पी. सिप्पी के ज्ञान चक्षु ज़रूर खुल गए। उन्होंने रमेश सिप्पी को अपने साथ फ़िल्म व्यवसाय में शामिल करने का फ़ैसला ले लिया। लंदन से बुलाकर अपने साथ शामिल कर लिया। इन दोनों फ़िल्मों ‘ब्रह्मचारी’ और ‘बंधन’ में उसे एग्ज़ीक्यूटिव प्रोड्यूसर की भूमिका दे दी। रमेश सिप्पी के आने के बाद सिप्पी फ़िल्म्स का कारोबार फिर से पटरी पर आ गया।

लंदन से आते-आते रमेश सिप्पी अपने साथ, अपनी पसंदीदा विदेशी फ़िल्मों के कुछ वीडियो कैसेट जिन्हें वी.एच.एस. भी कहा जाता है, लेते आए थे। इन्हीं फ़िल्मों में से एक फ्रेंच फ़िल्म थी, जिसका अंग्रेज़ी नाम था ‘अ मेन एंड अ वुमन।’ 1966 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म में विधवा और विधुर की प्रेम कहानी थी। इस फ़िल्म को उस साल कान फ़िल्म फ़ेस्टीवल में अवार्ड भी मिला था और सराहना भी। सिप्पी की ‘ब्रह्मचारी’ के लेखक सचिन भौमिक ने भी यह फ़िल्म देख रखी थी। लिहाज़ा इसी फ़िल्म को आधार बनाकर सचिन भौमिक ने एक पटकथा तैयार की, जिसके डायलाग लिखे गुलज़ार ने। फ़िल्म का नाम रखा गया ‘अंदाज़’(71)।

अब एक दिलचस्प बात यहां बताना ज़रूरी है। इस समय तक सिप्पी फ़िल्म्स के स्टोरी डिपार्टमेंट में सलीम ख़ान और जावेद अख़्तर की भी आमद हो चुकी थी। दोनों की जोड़ी बाकायदा तौर पर तब तक नहीं बनी थी। सो एक वरिष्ठ लेखक सतीश भटनागर के साथ ही यह दोनों भी माहाना तनख़्वाह पर मुलाज़िम हो गए। और तनख़्वाह भी दोनों की बराबर थी- 750-750।

फ़िल्म ‘अंदाज़’ में इन दोनों की काफ़ी सक्रिय भूमिका रही लेकिन पर्दे पर क्रेडिट टाइटल्स में क्रेडिट इस तरह नज़र आई। स्टोरी, स्क्रीनप्ले- सचिन भौमिक, एडीशनल स्क्रिप्ट वर्क- सतीश भटनागर, सलीम ख़ान, जावेद अख़्तर (सिप्पी फ़िल्म्स स्टोरी डिपार्टमेंट) और डायलाग- गुलज़ार।

‘ब्रह्मचारी’ के लिए बेस्ट एक्टर का अवार्ड जीतने वाले शम्मी कपूर इस वक़्त तक अपने कॅरिअर की ढलान पर थे। ऐसे वक़्त में पर्दे पर उछल-कूद करते, नाचते-गाते मस्ताने हीरो की भूमिकाएं निभाने की बजाय उन्होंने एक विधुर की भूमिका निभाना स्वीकार कर लिया। हेमा मालिनी को हीरोइन यानी विधवा मां का रोल मिला। लेकिन शम्मी कपूर की बतौर हीरो लगातार घटती लोकप्रियता से सिप्पीज़ की चिंताएं बढ़ गई थीं। ऐसे में ही सलीम-जावेद ने मिलकर राजेश खन्ना के लिए एक गेस्ट रोल लिखा, जो पूरी फ़िल्म की कामयाबी की वजह बन गया। उस पर फ़िल्माया गया गीत- ‘ज़िंदगी इक सफ़र है सुहाना, यहां कल क्या हो किसने जाना’ फ़िल्म का सबसे हिट गीत साबित हुआ।

और...

सलीम जावेद की हुनरमंदी से सिप्पी फ़िल्म्स का सारा यूनिट प्रभावित था, ख़ासकर रमेश सिप्पी और राजेश खन्ना। यही वजह थी कि रमेश सिप्पी ने अपनी अगली फ़िल्मों ‘सीता और गीता’, ‘शोले’ और ‘शान’ के लिए दोनों को ही साथ लिया। और राजेश खन्ना? सच तो यह है कि वो इस जोड़ी के बनने की एक वजह भी बन गए।

हुआ यूं था कि उन्हें मद्रास के एक प्रोड्यूसर सैंडो एम.एम.ए. चिन्नपा देवर की एक फ़िल्म आफ़र हुई थी- हाथी मेरे साथी। यह एक तामिल फ़िल्म का रीमेक था। राजेश खन्ना उस वक़्त अपने लिए जुबिली कुमार राजेंद्र कुमार का बंगला ख़रीदने को उतावले हो रहे थे और चिन्नपा देवर ने नगद पांच लाख रुपए का सूटकेस उनके सामने रख दिया था। सो फ़ट से फ़िल्म साईन कर ली।

फ़िल्म साईन तो कर ली लेकिन इस फ़िल्म की मूल स्क्रिप्ट बहुत लच्चर थी। राजेश खन्ना अपने इस हिट दौर में किसी फ़्लाप का ख़तरा मोल लेने को तैयार न थे। सो राजेश खन्ना ने सलीम ख़ान और जावेद अख़्तर से अनुरोध किया कि वह इस फ़िल्म स्क्रीन प्ले को ज़रा चुस्त-दुरुस्त कर दें। अब मैं तो उस वक़्त वहां था नहीं मगर इस बात को कहते-सुनते जो मंज़र यक-ब-यक मेरे सामने आया वो फ़िल्म ‘शोले’ के जय और वीरू का था। दोनों की नज़रें मिलीं और नज़रों-नज़रों में हो गई- ‘हां’। अब उसके बाद क्या। पर्दे पर पहली बार दोनों का नाम साथ आया- स्क्रीन प्ले- सलीम-जावेद। फ़िल्म हिट हो गई और साथ ही हिट हो गई सलीम-जावेद की जोड़ी।

जय-जय

अदाकारों में बबीता (राज़-67), रवीना टंडन (पत्थर के फूल-91) के नाम उल्लेखनीय हैं। सुपर स्टार राजेश खन्ना को हालांकि चेतन आनंद ने अपनी फ़िल्म ‘आख़िरी ख़त’ के लिए सबसे पहले साईन किया था, लेकिन उसकी रिलीज़ होने वाली पहली फ़िल्म जी. पी. सिप्पी की ‘राज़’ ही थी। शाहरुख़ ख़ान की बतौर पहली अहम फ़िल्म भी इसी बैनर की ‘राजू बन गया जेंटलमैन’(92) थी जिसके निर्देेशक थे अज़ीज़ मिर्ज़ा। उनकी भी यह पहली ही फ़िल्म थी। और हां, फ़िल्मों को जूनियर महमूद भी ‘ब्रह्मचारी’(68) के ज़रिए ही मिला।

जी. पी. सिप्पी का फ़िल्मी सफ़र मज़े-मज़े से चल रहा था। साठ के दशक में भी ‘जोहर महमूद इन गोआ’(65) और ‘मेरे सनम’(65) जैसी कामयाब फ़िल्मों के साथ ज़िंदगी में बहार ही बहार थी। बस इससे अगले कदम पर ही एक पंगा था जिससे गोपालदास जी के जीवन में एक बड़ा मोड़ आने वाला था। उन्होंने शम्मी कपूर, राजश्री, मुमताज़ और प्राण को लेकर शुरू की फ़िल्म ‘ब्रह्मचारी’। इस फ़िल्म के लेखक थे सचिन भौमिक और निर्देशक भप्पी सोनी। शुरुआत तो ठीक रही लेकिन फ़िल्म के बनते-बनते सिप्पी और सोनी में फिल्म को लेकर गहरे मतभेद पैदा हो गए।

भप्पी सोनी किसी वक़्त राज खोसला के असिस्टेंट रहे थे। 1960 में ‘एक फूल चार कांटे’(60) और ‘जानवर’(65) जैसी सफ़ल फ़िल्में बनाकर नाम कमा चुके थे। उनको अपनी प्रतिभा पर बहुत भरोसा था। सो वह अपनी बात पर अड़ गए। फ़िल्म अटक गई। धंधा रुक जाने से सिप्पी फ़िल्म्स में पैसे की किल्लत हो गई। किस्मत से उसी वक़्त उनकी एक और फ़िल्म ‘बंधन’ भी बन रही थी। इस विवाद की वजह से इसका निर्माण भी रुक गया। भप्पी सोनी ने वो हालात पैदा कर दिए कि सिप्पी अपने डायरेक्टर के आगे बेबस से हो गए।

कामयाब से कामयाब इंसान भी हालात के आगे हार जाता है। सिप्पी के मामले में भी ऐसा ही कुछ हो रहा था। उन्होंने हिम्मत हार ली और फ़िल्मी दुनिया को छोड़ देने का मन बना लिया। इतना ही नहीं, वो इतने बद-दिल हो गए कि उन्होंने बम्बई छोड़कर लंदन बसने का फ़ैसला ले लिया। बता दूं कि सिप्पी ने लंदन में एक होटल भी ख़रीदा हुआ था, जो अच्छा-भला कारोबार कर रहा था। बड़ा बेटा अजीत इस काम को सम्हाल रहा था, जबकि दूसरा बेटा रमेश लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में पढ़ाई कर रहा था। तीसरा बेटा विजय अपने पिता के साथ था और चौथा बेटा सुरेश भी बम्बई में ही था। एक बेटी थी सोनी सो भी तब बम्बई में ही थी।

परिवार की हौसला अफ़ज़ाई और काफ़ी सोच-विचार के बाद सिप्पी साहब ने हारकर मैदान छोड़ने के बजाय हालात का सामना करने का फ़ैसला कर लिया। भप्पी सोनी भी इन तेवरों को देखकर थोड़े सम्हल गए। आख़िर कुछ लोगों के बीच-बचाव से ‘ब्रह्मचारी’ का विवाद ज्यों-त्यों सुलझा लिया गया और फ़िल्म कम्प्लीट होकर रिलीज़ हो गई। सिल्वर जुबिली हिट साबित हुई। ‘बंधन’ भी कामयाब हो गई।

इस विवाद के चलते ही जी.पी. सिप्पी के ज्ञान चक्षु ज़रूर खुल गए। उन्होंने रमेश सिप्पी को अपने साथ फ़िल्म व्यवसाय में शामिल करने का फ़ैसला ले लिया। लंदन से बुलाकर अपने साथ शामिल कर लिया। इन दोनों फ़िल्मों ‘ब्रह्मचारी’ और ‘बंधन’ में उसे एग्ज़ीक्यूटिव प्रोड्यूसर की भूमिका दे दी। रमेश सिप्पी के आने के बाद सिप्पी फ़िल्म्स का कारोबार फिर से पटरी पर आ गया।

जी.पी. सिप्पी फ़िल्में बनाते रहे, माल बनाते रहे और फिर माल लगाते रहे। मतलब उनका नज़रिया- तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा वाला था। जब फ़िल्म चल जाती तो उसकी कमाई से नए-नए प्रयोग करते। ब्लैक एंड व्हाइट वाले ज़माने में ही उन्होंने हिन्दुस्तानी सिनेमा की पहली गेवाकलर फ़िल्म बनाई- ‘शहंशाह’ (1953)। कामिनी कौशल और रंजन की मुख्य भूमिकाओं वाली इस फ़िल्म के निर्देशक थे अमिया चक्रवर्ती। कहा जाता है कि इस फ़िल्म के निर्माण पर उस ज़माने में 30 लाख रुपए ख़र्च किए थे, जो उस वक़्त एक बड़ी रकम थी।

इसी तरह हिंदुस्तान की पहली 6 ट्रेक स्टीरियोफ़ोनिक साउंड के साथ 70 एम. एम. फ़िल्म ‘शोले’ भी सिप्पी का ही कमाल था। टेलीविज़न में भविष्य देखने में भी वे सबसे आगे रहे। वे पहले बड़े फ़िल्मकार थे, जिन्होंने 1986 में ही बड़े पर्दे के साथ ही साथ टीवी सीरियल्स की तरफ़ कदम बढ़ाए। 1947 के भारत के बंटवारे पर आधारित उस सीरियल का नाम था ‘बुनियाद।’ ‘हम लोग’(1984) जैसा सफ़ल सीरियल देने वाले मनोहर श्याम जोशी के लिखे और रमेश सिप्पी के साथ ज्योति स्वरूप के निर्देशित 105 एपीसोड आज भी लोगों की यादों में बसे हैं। पहले दूरदर्शन, फिर मेट्रो दूरदर्शन और फिर बरसों बाद सहारा वन पर रिपीट होने वाले इस सीरियल ने हिन्दुस्तानी टीवी के भविष्य की राह रोशन की। कमाल तो यह कि इस सीरियल को हिंदुस्तान के साथ पाकिस्तान- ख़ासकर लाहौर- में भी उतने ही चाव से देखा जाता था।

इस सीरियल ने ही आलोक नाथ- मास्टर हवेलीराम, अनीता कंवर- लाजो जी को घर-घर का चहेता बना डाला था। इसी सीरियल से कई सारे नए और संघर्षशील कलाकारों- जैसे आलिया भट्ट की मां सोनी राज़दान (भट्ट), कृतिका देसाई, मंगल ढिल्लों, अभिनव चतुर्वेदी जैसे कलाकारों को भी पहचान मिली। यूं भी जी.पी. सिप्पी की ढेर सारी ख़ूबियों में से एक ख़ूबी नए टैलेंट को मौका देने की भी रही है। ज़िद्दी, लव इन टोक्यो, नया ज़माना, ड्रीम गर्ल और आज़ाद जैसी कामयाब फ़िल्मों के निर्देशक प्रमोद चक्रवर्ती को डायरेक्शन का पहला मौका सिप्पी ने 1958 की फ़िल्म ‘12 ओ’क्लाक’ में दिया था। इसी तरह राजेंद्र सिंह बेदी के प्रतिभावान पुत्र नरेंद्र बेदी को भी फ़िल्म डायरेक्ट करने का पहला अवसर मिला सिप्पी फ़िल्म्स की ‘बंधन’(69) से।

अदाकारों में बबीता (राज़-67), रवीना टंडन (पत्थर के फूल-91) के नाम उल्लेखनीय हैं। सुपर स्टार राजेश खन्ना को हालांकि चेतन आनंद ने अपनी फ़िल्म ‘आख़िरी ख़त’ के लिए सबसे पहले साईन किया था, लेकिन उसकी रिलीज़ होने वाली पहली फ़िल्म जी. पी. सिप्पी की ‘राज़’ ही थी। शाहरुख़ ख़ान की बतौर पहली अहम फ़िल्म भी इसी बैनर की ‘राजू बन गया जेंटलमैन’(92) थी जिसके निर्देेशक थे अज़ीज़ मिर्ज़ा। उनकी भी यह पहली ही फ़िल्म थी। और हां, फ़िल्मों को जूनियर महमूद भी ‘ब्रह्मचारी’(68) के ज़रिए ही मिला।

आपस की बात

राजकुमार केसवानी



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